कल्पना कीजिए एक ऐसे गाँव की जहाँ पानी की भारी किल्लत हो गई है। लोग न तो किसी निजी कंपनी द्वारा महँगा बोतलबंद पानी बेचने का इंतज़ार करते हैं, और न ही राजधानी से किसी सरकारी अफ़सर के आने की राह देखते हैं। इसके बजाय, हर परिवार से एक सदस्य पहाड़ी पर खाई खोदने, पेड़ लगाने और छोटे चेक-डैम बनाने निकलता है। कुछ ही मौसमों में कुएँ दोबारा भर जाते हैं। यही साझी ज़िम्मेदारी और आपसी कर्तव्य की भावना समुदायवाद की आत्मा है।
समुदायवादियों का मानना है कि आधुनिक राजनीति व्यक्ति पर ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान देती है। उदारवादी सिर्फ़ व्यक्तिगत अधिकारों की बात करते हैं, पूँजीवादी केवल ख़रीदार और विक्रेता देखते हैं, और समाजवादी सिर्फ़ राज्य और वर्ग की भाषा बोलते हैं। समुदायवादी कहते हैं कि ये तीनों एक बुनियादी सच भूल जाते हैं: इंसान अपने परिवार, पड़ोस, साझी परंपराओं और स्थानीय समाज से बनता है।
भारत में रालेगण सिद्धि जैसे सूखाग्रस्त गाँवों ने सामूहिक श्रम और जल-संरक्षण के ज़रिए बंजर ज़मीन को उपजाऊ बनाकर मिसाल पेश की। युद्ध के बाद पश्चिमी यूरोप में ईसाई लोकतंत्रवादियों ने मज़बूत परिवार और सामाजिक संस्थाओं पर आधारित कल्याणकारी व्यवस्था खड़ी की। सिंगापुर ने सार्वजनिक आवास में जातियों के मिले-जुले रहने का नियम बनाया ताकि अलग-थलग बस्तियाँ न बनें।
समुदायवाद न तो पूरी तरह वामपंथी है और न ही दक्षिणपंथी। यह वामपंथ की तरह सामाजिक सुरक्षा और ग़रीबों की मदद का समर्थन करता है, लेकिन दक्षिणपंथ की तरह परंपरा, पारिवारिक मूल्यों और नागरिक कर्तव्यों का आदर करता है। इसका मानना है कि सिर्फ़ स्वार्थी व्यक्तियों से अच्छा समाज नहीं बन सकता।
मुख्य विचार
🏘️परिवार और समाज पहले: आपसी रिश्तों, पड़ोस और भाईचारे को मज़बूत करना।
⚖️हक़ और ज़िम्मेदारी: अधिकारों के साथ-साथ समाज की सेवा का कर्तव्य।
🤝नैतिक बाज़ार: उचित मज़दूरी और ऐसी कंपनियाँ जो समाज का सम्मान करें।
राजनीतिक नक़्शे पर इसकी जगह
ideoMap के चार पैमानों पर इसकी आम जगह।
💰 अर्थव्यवस्थासामाजिक लोकतंत्रवादी
63% समानताबाज़ार 37%
👪 समाजपरंपरावादी
25% प्रगतिपरंपरा 75%
🛡️ नागरिक आज़ादीक़ानून-व्यवस्था समर्थक
38% स्वतंत्रतासत्ता 62%
🌍 विश्व राजनीतिव्यावहारिक यथार्थवादी
50% वैश्विकराष्ट्रीय 50%
जब यह कामयाब रहा
प्रेरक उदाहरण
पश्चिमी यूरोप का ईसाई लोकतंत्र
पश्चिमी यूरोप · 1945–1960 का दशक
युद्ध के बाद के नेताओं ने परिवारों को सहारा देने वाली कल्याणकारी व्यवस्था बनाई, सामाजिक संस्थाओं को मज़बूती दी और बाज़ार प्रतिस्पर्धा के साथ सामाजिक ताने-बाने की रक्षा की, जिससे एक स्थिर व समृद्ध समाज बना।
प्रेरक उदाहरण
रालेगण सिद्धि का पुनरुद्धार
भारत · 1975 से
महाराष्ट्र के एक सूखाग्रस्त गाँव ने सामूहिक श्रम, वृक्षारोपण और जल-प्रबंधन के बल पर ग़रीबी और जल-संकट को मिटाया, और बिना किसी बड़े बाहरी कर्ज़ के पानी, अनाज और साफ़ ऊर्जा में पूरी तरह आत्मनिर्भर बना।
प्रेरक उदाहरण
सिंगापुर की जातीय एकीकरण नीति
सिंगापुर · 1989 से
सरकार ने हर हाउसिंग ब्लॉक में चीनी, मलय और भारतीय नागरिकों के लिए कोटा तय किया ताकि अलग-थलग बस्तियाँ न बनें, और सभी संस्कृतियों के लोग रोज़मर्रा की ज़िंदगी में साथ रहकर सामाजिक शांति बनाए रखें।
जब यह नाकाम रहा
सबक़ देने वाला उदाहरण
पाकिस्तान की जिरगा के 'इज़्ज़त' वाले फ़ैसले
पाकिस्तान · आज भी
गाँवों की अनौपचारिक पंचायतें (जिरगा) 'समाज की इज़्ज़त' को क़ानून से ऊपर रखती हैं और अपनी पसंद से शादी करने वाले जोड़ों को सज़ा देती हैं; पाकिस्तान में हर साल लगभग 1,000 'ऑनर किलिंग' दर्ज होती हैं।
सबक़ देने वाला उदाहरण
अमेरिका में शराबबंदी का दौर
अमेरिका · 1920–1933
धार्मिक और नैतिक समूहों के दबाव में पूरे देश में शराब पर लगाई गई पाबंदी बुरी तरह नाकाम रही; इससे काले बाज़ार का जन्म हुआ, अल कपोन जैसे हिंसक गिरोह पनपे और भारी भ्रष्टाचार फैला, जिसके बाद क़ानून वापस लेना पड़ा।
समर्थक क्या कहते हैं
मज़बूत परिवार, स्कूल और स्थानीय संगठन लोगों को ऐसा भावनात्मक सहारा और भरोसा देते हैं जो न निजी कंपनियाँ दे सकती हैं और न ही दूर बैठी सरकार।
अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों पर ज़ोर देने से समाज सिर्फ़ स्वार्थी उपभोग और अकेलेपन का शिकार होने से बचता है।
स्थानीय लोग अपनी समस्याओं को सबसे बेहतर समझते हैं और पानी, बुज़ुर्गों की देखभाल व सुरक्षा जैसी चीज़ें मिलकर बेहतर सुलझा सकते हैं।
आलोचक क्या कहते हैं
अत्यधिक जुड़े हुए समुदाय कई बार दमघोंटू बन जाते हैं और महिलाओं, अल्पसंख्यकों तथा अलग सोचने वालों की आज़ादी छीन लेते हैं।
सामुदायिक परंपराओं को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से ऊपर रखने के नाम पर अक्सर जबरन विवाह, जातिगत भेदभाव और भीड़ के इंसाफ़ को जायज़ ठहराया गया है।
आधुनिक बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था में काम के लिए लोगों का इधर-उधर जाना ज़रूरी है, जिसमें पुराने पारंपरिक सामुदायिक मॉडल कई बार रुकावट बनते हैं।
जानी-मानी हस्तियाँ
नानाजी देशमुख
भारत · 1916–2010
प्रसिद्ध समाज सुधारक जिन्होंने सक्रिय राजनीति छोड़कर चित्रकूट में दीनदयाल शोध संस्थान बनाया और सैकड़ों गाँवों में स्वास्थ्य, साक्षरता और विवाद-मुक्त ग्राम का समग्र स्वावलंबन मॉडल खड़ा किया।
दीनदयाल उपाध्याय
भारत · 1916–1968
'एकात्म मानववाद' के प्रणेता, जिन्होंने पश्चिमी व्यक्तिवादी पूँजीवाद और मार्क्सवादी वर्ग-संघर्ष दोनों को नकारते हुए परिवार, समुदाय और समाज के जैविक संतुलन पर आधारित भारतीय दर्शन दिया।
अमिताई एट्ज़ियोनी
अमेरिका · 1929–2023
मशहूर समाजशास्त्री जिन्होंने आधुनिक समुदायवादी आंदोलन की नींव रखी और दलील दी कि केवल अधिकारों की माँग करने और नागरिक कर्तव्यों को भूल जाने से पश्चिमी समाज खोखला हो रहा है।
आम सवाल
समुदायवाद और पारंपरिक रूढ़िवाद में क्या अंतर है?
हालाँकि दोनों ही परिवार और सामाजिक ताने-बाने को अहमियत देते हैं, लेकिन पारंपरिक रूढ़िवाद पुरानी सत्ता, पदक्रम और ऐतिहासिक संस्थाओं को जस-का-तस बनाए रखने पर ज़ोर देता है। इसके विपरीत, समुदायवाद स्थानीय लोगों के स्वैच्छिक सहयोग, भाईचारे और ज़िम्मेदारियों पर केंद्रित है। कई समुदायवादी मज़बूत सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा और मज़दूरों के कल्याण जैसी नीतियों का भी समर्थन करते हैं, जिनका रूढ़िवादी अक्सर विरोध करते हैं।
क्या भारत की ग्राम पंचायतें समुदायवाद का उदाहरण हैं?
हाँ, पंचायतें स्थानीय समस्याओं को मिलकर सुलझाने और साझी संपत्तियों की देखरेख करने के समुदायवादी सिद्धांत पर चलती हैं। लेकिन भारतीय अनुभव इसका स्याह पहलू भी दिखाता है: पारंपरिक जाति पंचायतों और खाप पंचायतों ने कई बार जातिगत भेदभाव थोपा है और अपनी मर्ज़ी से जीने वालों को प्रताड़ित किया है। इसलिए सच्चा समुदायवाद तभी न्यायसंगत है जब वह बुनियादी मानवाधिकारों का सम्मान करे।
क्या समुदायवाद व्यक्तिगत अधिकारों का विरोधी है?
ज़रूरी नहीं। आधुनिक समुदायवादी मानवाधिकारों और नागरिक आज़ादियों को छीनना नहीं चाहते। उनका कहना सिर्फ़ इतना है कि अधिकारों के साथ ज़िम्मेदारियाँ भी होनी चाहिए। अगर हर नागरिक सरकार से सिर्फ़ सुविधाएँ माँगेगा लेकिन अपने पड़ोस, बुज़ुर्गों और साझी समस्याओं की परवाह नहीं करेगा, तो पूरा समाज बिखर जाएगा।